भारत का जल संकट समाधान, नीर-नारी-नदी का सम्मान

Sarkaritel
By Sarkaritel December 2, 2019 15:08


भारत आज सुखाड़, बाढ़ और दुष्काल से ग्रस्त है। आजादी के बाद सुखाड़ क्षेत्र दस गुना बढ़ा है, वहीं बाढ़ क्षेत्र आठ गुना बढ़ा है। लगभग आधी छोटी नदियां मर गई हैं या लुप्त हो गई हैं। भूजल के भंडार दो तिहाई पुर्नभरण से ज्यादा शोषण के खिलाफ हैं। भारत में कुछ सूखी मरी नदियां गंदा नाला बनकर वर्ष भर बहती दिखाई देती हैं। जैसे रू- गंगा, यमुना, हिंडन, कृष्णा, रामगंगा, गोमती, घाघरा, शारदा, सोन इत्यादि। इस संकट को हम सभी स्वीकारते हैं। इन संकटों का समाधान केवल नदीजोड़ बता रहे हैं। भारत में सतलुज, यमुना, व्यास नदी जोड़ सबसे पुराना है। उसकी नहरें भी बन गई हैं। सब कुछ बन गया है परन्तु पंजाब ने पानी देने से मना कर दिया है। भारत सरकार, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद हरियाणा को पानी न दिला सकी। यह अकेली घटना नहीं है, चारों ओर भारत में जल व नदी के विवाद हैं। नया विवाद महानदी का है, जिस पर एक राज्य ने छोटे बैराज कहकर बड़े बैराज बना लिए। जब दूसरे राज्य को यह पता चला तो उसने सभी राजनैतिक दलों को लामबंद कर संसद की कार्यवाही भी रुकवा दी। नदीजोड़ का मुद्दा भी राजनीतिक सुविधानुसार उठाया जाता है।

जो लोग नदियों के लिए, पानी के लिए बातचीत करते हैं, वो भी सब नदीजोड़ को ही समाधान बताने लगे हैं। जो नदियों के जल प्रवाह स्तर के बारे में, नदियों के चरित्र के बारे में, नदी और मानव की सेहत के संबंधों के बारे में नदी और जल, जंगल जमीन के बारे में नहीं जानते हैं, वो सामने खड़े होकर बहुत जोरों से नदी जोड़ की वकालत करने लगते हैं। इस वकालत ने भारत की जनता के बीच एक अजीब-सा बिखराव शुरू कर दिया है।

कोई नहीं जानता कि आज नदियों को बीमारी क्या है? नदीजोड़, सड़क जोड़ जैसा नहीं है। नदियां सभ्यता एवं संस्कृति का आधार रही हैं। सभी नदियों का जीव-जगत व्यक्ति के रक्त की तरह अलग-अलग होता है। जैसे दो अनजान व्यक्तियों का रक्त एक जैसा नहीं होता, इसी प्रकार एक नदी का जल दूसरी नदी में नहीं मिलाया जा सकता है। इसका अर्थ है कि ऐसा करने से भारतीय आस्था और पर्यावरणीय रक्षा का वह संकट पैदा होगा, जिसको यथास्थिति में नहीं ला सकेंगे।

भारत का समाज नदियों को अपना जीवन, जीविका, जागीर, संस्कृति एवं सभ्यता और अध्यात्म मानता है। नदीजोड़ इन सभी व्यवहारों एवं सरकारों को तोड़ने वाला है। भारतीय समाज का व्यवहार एवं संस्कार तोड़ने का अर्थ है, भारतीय विविधता का सम्मान किए बिना उसकी एकता और अखंडता को चुनौती देना। इसलिए अब समय आ गया है, जब भारतीय जनता को स्वयं नदी जोड़ से होने वाले भावी संकटों को समझकर, चुनावी रंगों में बिना रंगे, अपने अंदर की आवाज से नदीजोड़ द्वारा भारत की सभ्यता और संस्कृति को तोड़ने वाले इस षड्यंत्र का खुलासा करके रोकने में जुटना चाहिए।

गंगा, यमुना सिंध, कृष्णा, कावेरी नदियों को हम अपने राष्ट्रीय गान में नित्य ही गाते हैं, लेकिन इनकी सेहत का ख्याल नहीं करते। भूल गए हैं कि नदियों की सेहत और हमारी सेहत एक दूसरे से जुड़ी हुई है। नदी की सेहत खराब होगी तो भारत की राजनीति, सभ्यता, संस्कृति, सामाजिक और आर्थिक दशा खराब होगी। इस भारत का जल संकट समाधान, नीर-नारी-नदी का सम्मान खराबी को रोकने का उपाय हमें करना चाहिए। हम इस उपाय से बचेंगे तो नदियां हमारे उपायों को बिगाड़ देंगी। नीर-नारी – नदी का सम्मान जरूरी है। इसमें भटकाव नहीं होना चाहिए। नदी के सदाचार को मानव सदाचार के साथ जोड़ना आवश्यक है। हम नदी की आवश्यकताओं की ओर नहीं मुड़ रहे हैं। नदियों का संकट हमारा ही संकट है। जहां समझा वहां प्रयास हुए जैसे महाराष्ट्र के सांगली में अग्रणी, राजस्थान के करौली में महेश्वरा, सैरनी, उत्तर प्रदेश के ललितपुर में बंडई, महाराष्ट्र में अम्बेजोगई की होरप्पा और वरणा, तमिलनाडु में भी कई नदियों पर नई कोशिशें शुरू हुई हैं। कर्नाटक राज्य की ईचनहल्ला में काम हुआ है। इस काम से केवल नदियां ही पुनर्जीवित नहीं हुई हैं, पूरा समाज ही पुनर्जीवित हुआ है। जल और नदी के संकट से उजड़ा हुआ समाज पुनः आकर बस गया। हमें इसी तरह से देशभर की सभी नदियों के संकट का समाधान करने के लिए नदी साक्षरता का अभियान चलाने की जरूरत है। नदी साक्षरता समाज को नदीयों से जोड़कर नदियों का संकट मिटा सकती है।

नदियों का संकट भूजल शोषण से जन्मा है। जब भूजल भण्डार खाली होते हैं तो नदियों का जल प्रवाहित नहीं होता। नदियों का जल प्रवाह बनाना और उसको प्रदूषण, अतिक्रमण और शोषण मुक्त बनाना अति आवश्यक है। भारत की नदियों की अविरलता और निर्मलता की कल्पना गांव और शहरों के परम्परागत जल प्रबंधन से ही सम्भव है।

राजस्थान में लोगों ने ऐसा कर दिखाया है। परम्परागत जल प्रबंधन से दस हजार आठ सौ चालीस वर्ग कि.मी. क्षेत्र जो बेपानी था, उसे पानीदार बनाया है। आठ नदियों को भी पानीदार बना दिया गया। देश का सबसे कम वर्षा वाला क्षेत्र होने के बाद राजस्थान की आठ नदियों का जल संकट दूर कर सकते हैं तो पूरे देष में यह हो सकता है। नदियों का जल संकट मिटाने में यदि लोभ और लालच प्रभावी होगा तो यह नदी जल संकट नहीं मिटाया जा सकता।

जल प्रदूषण से 66 प्रतिशत बीमारियाँ बढ़ी हैं। आज भारत के 254 जिलों में सुखाड़ और सैकड़ों जिलों में बाढ़ एक साथ दिखता है। इनकी मार से लोग लाचार-बीमार और बेकार होकर अपनी पलायन को भी मजबूर हैं। पलायन लोगों के मन-मानस का संतुलन बिगाड़ देता है। जल प्रदूषण से जीवन में लाचारी-बेकारी और बीमारी बढ़ जाती है। इसलिए नीर-नारी – नदी का सम्मान करें, जल समाधान तय है।

– राजेंद्र सिंह, जलपुरूष, मैगेसेसे पुरस्कार विजेता, तरूण भारत संघ

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