भोपाल में मध्य प्रदेश के राज्यपाल एवं कुलाधिपति मा० श्री मंगुभाई पटेल जी द्वारा प्रख्यात परंपरागत जल संरक्षण, जल योद्धा, पद्मश्री सम्मानित उमाशंकर पाण्डेय जी को डॉक्टर ऑफ लिटरेचर (D.Litt.) की मानद उपाधि से अलंकृत किया गया। यह सम्मान जल संरक्षण के क्षेत्र में उनके दशकों से चले आ रहे अतुलनीय योगदान का गौरवपूर्ण प्रमाण है।

इस गरिमामयी अवसर पर हम महामहिम राज्यपाल जी के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं। साथ ही आईईएस विश्वविद्यालय, भोपाल के मा० कुलाधिपति श्री बी.एस. यादव जी एवं मा० कुलपति डॉ. डी.के. पाण्डेय जी का भी धन्यवाद ज्ञापित करते हैं, जिनके मार्गदर्शन में यह आयोजन सम्पन्न हुआ।
इसी समारोह में जिन अन्य विशिष्ट विभूतियों को मानद डॉक्टरेट उपाधि से सम्मानित किया गया, उनमें पद्मश्री एवं राज्यसभा सांसद पी.टी. उषा जी (अध्यक्ष, भारतीय ओलंपिक संघ), प्रतिष्ठित क्रिकेट खिलाड़ी एवं कोच चंद्रकांत पंडित, राज्यसभा सांसद गोविंद लालभाई ढोलकिया, तथा एम्स के अध्यक्ष डॉ. जे.एस. टिटियाल शामिल हैं।
इस अवसर पर अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे, जिनमें राज्यसभा सांसद डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी, मती माया नारोलिया, डॉ. कविता पाटीदार, मध्य प्रदेश निजी विश्वविद्यालय नियामक आयोग के अध्यक्ष प्रो. खेम सिंह, तथा पशुधन विकास मंत्री लखन सिंह पटेल प्रमुख रहे।
जल संरक्षण के प्रतीक : उमाशंकर पाण्डेय
पद्मश्री से सम्मानित उमाशंकर पाण्डेय जी केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि परंपरागत जल संरक्षण और सामुदायिक जल सशक्तिकरण के जीवंत प्रतीक हैं। भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय द्वारा उन्हें राष्ट्रीय जल योद्धा सम्मान से भी अलंकृत किया गया है। वे बुंदेलखंड (उत्तर प्रदेश) के सुप्रसिद्ध ‘जलग्राम मेड़बंदी यज्ञ अभियान’ के संस्थापक हैं।
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के जखनी गाँव में जन्मे श्री पाण्डेय ने पारंपरिक जल संरक्षण सूत्र “खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़” को एक जन-आंदोलन का रूप दिया। यह केवल नारा नहीं, बल्कि बंजर भूमि को हरियाली में बदलने, वर्षा जल को संचित करने और किसानों के जीवन में समृद्धि लाने का सिद्ध सामुदायिक मॉडल है।
उनके प्रयासों से बुंदेलखंड सहित देश के अनेक सूखाग्रस्त क्षेत्रों के सैकड़ों गाँव ‘जलग्राम’ में परिवर्तित हो चुके हैं। आज यह मॉडल देशभर के हजारों गाँवों में जल प्रबंधन की प्रेरणा बन चुका है, जिसे लाखों किसान सफलतापूर्वक अपना रहे हैं।
जल शिक्षा और जन-जागरण का व्यापक अभियान
श्री पाण्डेय के मार्गदर्शन में देश के 10 से अधिक सूखा प्रभावित राज्यों में वर्षा जल संरक्षण हेतु 3000 से अधिक ‘पानी की पाठशालाएँ’ संचालित की गईं, जिनके माध्यम से 10 लाख से अधिक विद्यार्थियों को पारंपरिक, सरल और व्यवहारिक जल संरक्षण विधियों का प्रशिक्षण दिया गया। इसमें प्राथमिक से लेकर इंटर कॉलेज तक के छात्र एवं हजारों शिक्षक सहभागी बने। इस जन-अभियान को राज्य, समाज और सरकार—तीनों का भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ।
उनके प्रयासों से ही अटल भूजल योजना का स्वरूप विकसित हुआ, जिसे देश की 10,000 से अधिक ग्राम पंचायतों में लागू किया गया तथा 1050 से अधिक जलग्राम विकसित किए गए।
संघर्ष, संकल्प और सामाजिक परिवर्तन
शारीरिक दिव्यांगता और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद श्री पाण्डेय ने कभी हार नहीं मानी। बिना किसी सरकारी सहायता के, उन्होंने पूर्वजों की पारंपरिक विधियों और सामुदायिक श्रम के माध्यम से जल संरक्षण को नई दिशा दी।
“सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” की भावना के साथ उन्होंने ग्रामीण विकास, कृषि उत्पादन वृद्धि, रोजगार सृजन और बुंदेलखंड से पलायन रोकने में ऐतिहासिक योगदान दिया।
राष्ट्रीय दायित्व और सम्मान
श्पाण्डेय उत्तर प्रदेश सरकार एवं भारत सरकार की कई महत्वपूर्ण समितियों के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में वे भारत रत्न नाना जी देशमुख द्वारा स्थापित दीनदयाल शोध संस्थान (DRI) की प्रबंध समिति, कृषि किसान कल्याण मंत्रालय के प्राकृतिक खेती मिशन, जल शक्ति मंत्रालय की नेशनल वाटर अवार्ड ज्यूरी, तथा गंगा संरक्षण, नदी संरक्षण, पेयजल एवं स्वच्छता से जुड़ी समितियों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। नीति आयोग और जल शक्ति मंत्रालय ने उनके कार्यों को राष्ट्रीय मॉडल के रूप में मान्यता दी है।
सम्मान एवं पुरस्कार
वर्ष 2023 : महामहिम राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री सम्मान
वर्ष 2020 : जल शक्ति मंत्रालय से राष्ट्रीय जल पुरस्कार
वर्ष 1999 : उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राज्य पुरस्कार
वर्ष 1999 : Sarkaritel.com जल योद्धा सम्मान
वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, संत विनोबा भावे सम्मान, जल प्रहरी सम्मान, द वाटर डाइजेस्ट अवार्ड सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान
भविष्य की दृष्टि : जल आंदोलन से जल क्रांति
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की प्रेरणा से प्रभावित श्री पाण्डेय ने पारंपरिक मेड़बंदी को आधुनिक जल प्रबंधन से जोड़ा। उन्होंने देश के 150 से अधिक विश्वविद्यालयों, आईआईटी, आईआईएम और प्रशिक्षण संस्थानों में युवाओं के साथ जल संवाद स्थापित किया।
“अटल भूजल यात्रा”, “जल के लिए चल”, “जल कोष यात्रा” और “पानी की पाठशाला” जैसे अभियानों के माध्यम से उन्होंने जल संरक्षण को जन-आंदोलन बनाया। उनका स्वप्न है कि भारत में विश्व का पहला ‘जल विश्वविद्यालय’ स्थापित हो, जहाँ जल संग्रहालय, जल पुस्तकालय और प्रत्येक ग्राम पंचायत में सामुदायिक सहभागिता से जल शिक्षा का प्रसार हो—ताकि जल आंदोलन, जन आंदोलन बनकर जल क्रांति का रूप ले सके।







