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रमन कान्त – रिवरमैन ऑफ इंडिया

Raman Kant Nadi Putra

जब कोई व्यक्ति जीवन में एक दिशा चुनता है, तो उसके कदम सीमित हो सकते हैं; पर जब कोई दिशा उसे चुनती है, तो वह राह इतिहास बन जाती है। रमन कान्त—देशभर में “रिवरमैन ऑफ इंडिया” और समाज द्वारा स्नेहपूर्वक दिए गए नाम “नदीपुत्र”—उन चुनिंदा लोगों में से हैं जिनकी राह को शायद प्रकृति ने ही चुना

भारत में नदियों की बिगड़ती हालत पर जब अधिकांश लोग चिंता तो जताते थे, पर कदम बहुत कम उठाते थे—ऐसे समय में रमन कान्त ने वर्ष 2001 में पानी और पर्यावरण की रक्षा को जीवन का ध्येय बना लिया। तीन वर्षों तक पर्यावरणविद् अनिल राणा के मार्गदर्शन में काम करने के बाद, 2004 में उन्होंने नीर फाउंडेशन की स्थापना की और अपनी जन्मभूमि गंगा–यमुना दोआब को ही अपना कर्मक्षेत्र बनाया।

raman kant collage

रमन कान्त की मान्यता सरल है—प्रकृति हमें जितना देती है, उसका मूल्य चुकाना हमारा कर्तव्य है। उनके लिए पर्यावरण संरक्षण कोई आयोजन नहीं, बल्कि जीवनशैली है। बच्चों में प्रकृति-प्रेम जगाने से लेकर किसानों को रसायन-मुक्त खेती की ओर मोड़ने और महिलाओं को “नीर–नारी” संबंध से जोड़ने तक, उन्होंने समाज के हर वर्ग को जल-संरक्षण की मुख्यधारा में लाने पर जोर दिया।

तालाबों का पुनर्जीवन, वर्षाजल मॉडल और ग्रामीण जागरूकता—20 वर्षों की उपलब्धियाँ

बीते दो दशकों में रमन कान्त ने सैकड़ों तालाबों को पुनर्जीवित किया और 150 से अधिक वर्षाजल संरक्षण मॉडल तैयार किए। उनके प्रयासों से उत्तर प्रदेश की नदी नीति, भू-गर्भ जल कानून और तालाब विकास कार्यक्रमों को नई दिशा मिली।

नीतिगत योगदान के साथ मैदान में सक्रियता—यही उनकी पहचान है। काली और हिण्डन नदियों का तकनीकी अध्ययन, प्रदूषण मुक्त गुड़ इकाई, फसल अवशेष न जलाने के नवाचार और देश के पहले ग्रामीण रेन सेंटर की स्थापना उनकी दूरदर्शी सोच का उदाहरण हैं।

नदी पुनर्जीवन: आशा को फिर से नदी के रूप में बहाने की कोशिश

पिछले एक दशक से रमन कान्त ने नदी पुनर्जीवन को अपना प्राथमिक मिशन बना लिया है। हिण्डन, काली पूर्वी-पश्चिमी, कृष्णी, पांवधोई, सलोनी, नीम और करवन जैसी नदियों में उन्होंने उद्गम खोजने से लेकर उनकी धाराओं में जीवन लौटाने तक काम किया है।

नदी-जनजागरण यात्राएँ, गाँवों में नदी समितियाँ और जलदूत संगठन—इन सबने नदी आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाया। उनका “रमन नदी पुनर्जीवन मॉडल” एक ऐसा दस सूत्रीय ढाँचा है, जिसके आधार पर किसी भी छोटी नदी को पाँच से दस वर्ष में पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश की नई नदी नीति तैयार की गई।

भारतीय नदी परिषद्—देशभर के नदी योद्धाओं को जोड़ने वाला मंच

देश में बिखरे हुए नदी-प्रेमियों को एक छत के नीचे लाने के लिए उन्होंने भारतीय नदी परिषद् का गठन किया, जिसमें विभिन्न राज्यों के जल-कार्यकर्ता एक-दूसरे के प्रयासों को मजबूत कर रहे हैं। समाज ने उनके अटूट समर्पण को देखते हुए उन्हें “नदीपुत्र” की उपाधि दी है—एक ऐसा सम्मान जो उनके जीवन के काम को सबसे सटीक रूप में परिभाषित करता है।

इतिहास, लेखन और पर्यावरण—काम का विस्तार

रमन कान्त ने मेरठ के ऐतिहासिक जल स्रोतों का अध्ययन कर उन्हें दस्तावेजबद्ध किया है। वह पर्यावरण संदेश नामक मुखपत्र का संपादन भी करते हैं, और जल–पर्यावरण विषयों पर उनके सैकड़ों लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

प्रकृति को वे शिव का स्वरूप मानते हैं—इसलिए उनकी हर पहल, हर कदम और हर विचार प्रकृति के प्रति श्रद्धा से प्रेरित है। हजारों स्वयंसेवकों के साथ उनका लक्ष्य स्पष्ट है—गंगा–यमुना दोआब की खोई पहचान को पुनः स्थापित करना।

“जब तक ध्येय पूरा नहीं होगा, मेरी गति नहीं रुकेगी”

रमन कान्त का जीवन एक संदेश देता है—प्रकृति को बचाना कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है।
और इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए वे पूरी निष्ठा, मेहनत और ईमानदारी से आगे बढ़ रहे हैं।

गति का संकल्प

यह सिर्फ वाक्य नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का जीवन मंत्र है जिसने पानी को अपनी सबसे बड़ी पूजा माना है।

जब भी प्रकृति मुस्कुराती है, रमन कान्त की खुशी भी बढ़ जाती है—क्योंकि यही तो उनका सत्य है, यही उनका संघर्ष और यही उनकी सबसे बड़ी जीत।

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