मान सिंह
जल प्रौद्योगिकी केन्द्र
भा.कृ.अनु.प0 – भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान
नई दिल्ली-110012
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संबोधन में कई बार इस बात को रेखांकित किया है कि खेत और शरीर एक जैसा है। जैसे शरीर की कमियों की जांॅच के लिये विभिन्न प्रकार की प्रयोगशालाओं का सहारा लिया जाता है, वैसे ही खेतोें की मिट्टी की जांच के लिये भी समुचित संख्या मंे प्रयोगशालाएंॅ होनी चाहिए ताकि प्रत्येक खेत का ैवपस भ्मंसजी ब्ंतक बन सके। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह धारणा गलत है कि खेत में लबालब पानी होगा तभी अच्छी खेती हो सकेगी।
सिंचाई के अभ्यास के बारे मेें एक प्राकृतिक सत्य बात यह है कि गुणवत्ता की दृष्टि से पानी कितना भी अच्छा क्यों ने हो यह अपने साथ कम या अधिक लवण अवश्य लाता है। जब सिंचाई का अभ्यास सिंचित कमान ;बवउउंदकद्ध क्षेत्रों में 30, 40, 50 या 60 वर्ष से हो रहा हो तो उन खेतों में लवणता की समस्या अवश्य जनित होगी। इसके फलस्वरूप भूमि की उर्वरता में कमी होगी। स्वस्थ्य मृदा बनाये रखने के लिये भूमि से अवांक्षित लवण बाहर निकालने होंगे। लवण को बाहर निकालने में जल एवं उप सतही जल निकासी प्रौद्योगिकी की भूमिका प्रमुख रहेगी।
तटीय क्षेत्रों का भी एक उदाहरण लेकर कि मृदा लवणता की समस्या कैसे पनपती है, समझने का प्रयास करते हैं। पूर्वी समुद्र तट के राज्य पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश एवं तमिलनाडु के किसान क्यों गरीब है, उनकी उत्पादकता भी कम है, इसका प्रमुख कारण खारा पानी, अधिक पानी, लवणता से प्रभावित भूमि तथा जल निकासी का विधिवत व्यवस्था का न होना है। डाॅ. पी.के. मिश्रा के लेख ‘आपदाओं का असर घटाने की पहल‘ में चक्रवात, विश्व बैंक सहायता प्राप्त चक्रवात जोखिम कार्यक्रम का जिक्र किया गया है । प्राकृतिक आपदाओं से उपजी भूमि सतह पर दिखाई देने वाले नुकसान को सभी देख लेते है, परन्तु वहांॅ की कृषि योग्य भूमि के अंदरूनी स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है, कोई देख नहीं पाता है। इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है।\
इसको कुछ ऐसा समझा जाय जैसे कि अच्छी उपज के लिये मृदा में 4.5 कैध्उ लवणता ठीक-ठाक मानी जाती है। पूर्वी तट पर जब हर दूसरे या तीसरे वर्ष छोटे, मझोले या बडे़ चक्रवात या सुनामी आकर समुद्र का पानी कृषि भूमि पर गिराते है तो भूमि की लवणता क्या होती होगी, अन्दाजा लगाना मुश्किल है। बंगाल की खाड़ी के पानी की लवणता 48 से 50 कैध्उ होती है जो भूमि पर वांक्षित लवणता से 10 -12 गुना है। सुनामी उपरान्त तमिलनाडु के दो जिले कडलोर और नागापट्टिनम के उदाहरण सभी को ज्ञात है। ऐसे सुनामी से एक रात के बाद ही पूरी भूमि ऊसर में तब्दील हो जाती है और उस पर कोई फसल लेना असंभव हो जाता है।
बात स्पष्ट है कि इतना ज्यादा नमक फसल के जड़ों को पनपने नहीं देता है। इसका निदान सिर्फ उप सतही जल निकासी प्रौद्योगिकी है। इस प्रोैद्योगिकी की क्षमता है कि भूमि सतह से 80 से 100 से.मी. नीचे की मोटी परत से सभी पानी में घूलन शील लवण को बाहर कर देती है। इस टैेक्नालाॅजी पर नीदरलेैण्ड में पिछले 50 वर्षों में भूमि सुधार के लिये बहुत काम हो चुका है। उनसे बड़े पैमाने पर कैसे किया जाये सीखा जा सकता है।
प्रस्ताव यह है कि पूर्वी समुद्री तट के प्रभावित क्षेत्रों के 10 कि.मी. चैडे़ तट पर एक लाख हैक्टर खेतों पर प्रयोग के तौर पर ैनइ ैनतंिबम क्तंपदंहम ज्मबीदवसवहल स्थापित किये जायंे। इससे मृदा का स्वास्थ्य सदैव बना रहेगा, कृषि उपज कम से कम दो गुनी होगी, दो से बढ़कर तीन फसल की संभावना बढ़ जायेगी। ध्यान रहे कि इस पर खर्च औसतन सवा लाख प्रति हैक्टेर होगा। इस सुधार से उपजाऊ भूमि की उपलब्धता बढ़ जायेगी और भूमि अधिगृहण कानून आसानी से संसद में पारित हो सकेगा। ैनइ ैनतंिबम क्तंपदंहम ज्मबीदवसवहल मेें निवेश लाभकारी होगा, क्योंकि इस प्रौद्योगिकी से भूमि सुधार में एक हैक्टेर भूमि पर जो खर्च आयेगा उसका 100 गुना भूमि अधिग्रहण करने पर सरकार को भुगतान करना पड़ता है। अतः यह निवेश सदैव फायदे का रहेगा ।
ऐसी मान्यता है कि कभी-कभी कल्पना, परिकल्पना ज्ञान शाक्ति से भी ज्यादा शक्तिशाली सिद्ध हुई है। दीर्घकालिक जलापूर्ति और जल निकासी का समाधान मानव शरीर में विद्यमान धमनियों एवं नसों के माॅडल पर आधारित है। इसे संक्षेप में ।ट माॅडल की संज्ञा दी है। इस माॅडल की आंॅख से देखें तो इंटरलिंकिंग आॅफ रीवर ;त्पअमतद्ध जिसको अभी निर्मित किया जाना है, उसके माध्यम से ‘हर खेत को जल‘ तथा जलशक्ति मंत्रालय के सृजन उपरांत ‘हर घर को नल से जल‘ का समाधान पाया जा सकता है, इसे प्राप्त करने के लिए भारत की धरती पर बहुत बृहद पैमाने पर आधारभूत सुविधाएंॅ स्थापित करना होगा। यह मौलिक सोच विगत सत्तर से सौ वर्ष में किए गए सड़कों, रेलवे लाइनों, विद्युतीकरण और ढेर सारे मोबाइल, नेटवर्को के संजाल से प्रेरित है। सभी खेत और सभी घर के लिये जलापूर्ति एवं जलनिकासी संजाल जैसी आधारभूत सुविधाओं के सृजन में जो कुछ भी व्यय करना पडे़ उसके लिये राष्ट्र सोचे, सोचे ही नहीं राजनैतिक इच्छाशक्ति को बढ़ाकर इस पर निवेश भी करें।
।ट माॅडल का आधार मानव शरीर तुल्य है।
जिस तरह शरीर में विद्यमान प्रत्येक कोशिकाओं को नपा-तुला पोशक तत्वों से मिश्रित रक्त मिलता है, उसी तर्ज पर सभी लधु, मझोले एवं बडे़ किसानोें के हर भू-भाग पर ंिसंचाई, जल की आपूर्ति निरंतर पूरे वर्ष मुहैया हो जाए तो इसमें संदेह बिल्कुल नहीं कि गरीब किसान बारहों महीने छोटे-बडे़ खेत के हिस्सोें में कोई न कोई फसल उगाकर हरा रख सकता है। फलस्वरूप चाहे व गरीब किसान हो या खेतिहर मजदूर या किराएदार कृषक, वह भी नौकरी पेशेवर की तरह हर महीने अपने परिवार के लिये आमदनी का जरिया बना सकता है। देश के सम्पूर्ण बुद्धिजीवी वर्ग अर्थात् इंजीनियरों, वैज्ञानिकों एवं नीति निर्माताओं को इस तरह की आधारभूत सुविधाओं के निर्माण को एक चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए मन मंथन करना चाहिए। इसके कार्यान्वयन में किसी भी तरह की देरी भारत के सशक्त होने में, इसके सर्वांगीण विकास में बहुत बड़ी बाधा होगी। इस ।ट माॅडल की सार्थकता, राष्ट्र में बहने वाली सभी नदियों को आपस में जोड़कर हासिल किया जा सकता है। फलस्वरूप भविष्य में कृषि विकास की दर बढ़ा कर गरीब किसानों को खुशहाली प्रदान कर सकते हैं और भारत को सशक्त राष्ट्र की सूची में शामिल कर सकते हैं।

