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June 4, 2026
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भारतीय संत परंपरा के आकाश में सूर्य की तरह चमकते हैं संत रविदास – प्रहलाद सिंह पटेल

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भारतीय संत परंपरा में कई बहूमूल्य कीमती संत हुएए लेकिन भारतीय क्षितिज पर जिस तरह से संत रविदास चमकते है। इस तरह की चमक किसी और में खोजना मुश्किल है। संत रविदास के बारे में कई अनूठी बाते हैं। जिस समय वे रहे हैं। उस समय को जरा आप याद करिए। उस सयम जाति प्रथा के रोग को समझने की कोशिश करिए। संत रविदास के आगे अगर अपने को ब्रहमज्ञानी कहने वाले लोग झुकते है। अगर उस समय का ब्राह्मण समाज उनकी तारीफ करता है। वह भी काशी का ब्राह्मण समाज उन्हें नमन करता है। तो स्वभाविक है कि आप मान सकते है कि संत रविदास में कितनी चमक और उनकी भक्ति की कितनी धमक रही होगी। उस समय के समाज ने संत रविदास को आसानी से तो स्वीकार नहीं किया होगा। लेकिन रैदास जी की भक्ति में जो पवित्रताएजो शुद्धताए जो बहती हुई प्रेम की रस धारा थी। उसने उन सबको बाध्य कर दिया होगाए कि उनके आगे नतमस्तक हो जाए।

संत रविदास अपने जमाने में कई कीमती और महत्वपूर्ण बदलाव की बात करते है। हम सभी जानते है कि भगवान तक पहुंचने के कई रास्ते है। आप ध्यान से पहुंचिएए भक्ति से पहुंचिए। मीरा नृत्य करते करते पहुंच जाती है। तो शंकर ज्ञान का रास्ता चुनते है। संत रविदास की भक्ति का रास्ता कुछ इस तरह से समझ में आता है कि लगता है यह रास्ता हमारा है। सरलए सुगम और आसानी से चलने वाला रास्ता लगता है। उनकी भक्ती सहज और सरल रास्ते से होकर गुजरती हैएआप सोचिए की कोई भक्त अपनी रोज मर्रा की जिंदगी के काम करता हुआ दिखाई दे रहा है। और वह ठीक उसी समय अपने प्रभु को पाने के रास्ते पर भी चल पड़ा है। रैदास ऐसा नहीं कहते है कि कोई व्यक्ति अपना काम धाम छोड़कर और भक्ति में लीन हो जाए। वे अपना काम करते रहते है।

अपने जूता सिलने का काम करते रहते हैं। और भक्ति भी करते रहते है। जिस तरह से उनके गुरू भाई कबीर अपने जुलाहे का काम करते हुए अपनी भक्ति जारी रखते है। कबीर और रैदास दोनों गुरुभाई थे। ये दोनों संत रामानंद जी के शिष्य थे। संत रैदास और कबीर दोनों ही कर्मकांड में किसी भी तरह के दिखावे के विरोधी थे। जिस तरह कबीर अपने कर्म में ही भक्ति शामिल करते है। उसी तरह से रैदास भी अपना काम करते हुए प्रभु को याद करते रहते है। संत रैदास जी का जूता बनाना और भक्ति करते रहना कई तरह के प्रतीक स्थापित करता है। उनकी इस तस्वीर से यह साफ जाहिर होता है कि भगवान के लिए किसी भी तरह के आडंबर की जरूरत ही नहीं है। उसे साधारण ढंग से अति सहज तरीके से भी पाए जा सकते है।

उनकी साधना के उदाहरण से यह भी साफ जाहिर है कि हम यह नहीं कह सकते है कि हमें साधना के लिए भगवान के लिए अलग से समय चाहिए। तुम जो कर रहे हो उसी समय तुम पात्र हो इश्वर को पाने के लिए। उनकी साधना से यह रास्ता दिखता है कि जो व्यक्ति जूता बनाते समय इश्वर मे लीन है। वह इस कार्य को भी भगवान को समर्पित कर रहा है। जो व्यक्ति कपड़ा बुनता हुआ भी इश्वर को याद करता है। वह अपना कार्य उत्कृष्ठ तो करेगा ही इसके साथ ही दुनिया के तमाम मोह.माया से भी खुद ही अलग हो जाएगा।

संत रविदास की अगर आप परपंरा देखे तो उसमें आप को एक अलग तरह का वैभव दिखाई पड़ता है। वे संत रामानंद जी के शिष्य थे। रामानंद जी ने जिस व्यक्ति को अपना शिष्य स्वीकार किया होगा वह व्यक्ति साधारण नहीं हो सकता। इसके साथ ही वे और कबीर गुरू भाई थे। और इसके साथ ही जिस व्यक्ति को इश्वर प्राप्त हुआ हो। वह व्यक्ति कहे कि मेरा गुरू तो संत रैदास है। इससे बड़ी परंपरा और क्या हो सकती है। मीरा कहती है। गुरू मिलया रैदासजी। मीरा को संत रैदास के लिए गुरू काफी महत्वपूर्ण इसलिए भी हो जाता है कि जिस व्यक्ति को इश्वर खुद ही उपलब्ध हो वह किसी को अपना गुरू कहे। और यह भी सोचिए की मीरा कहां राजरानी और गुरू रैदास सड़क पर बैठकर जूता सिलने वाले। फिर भी मीरा झुकती है और रेदास को अपना गुरू कहती है।

हमारे बुंदेलखंड मे कहावत है कि फल से वृक्ष को पहचाना जाता हैए पुत्र से पिता को और शिष्य़ से गूरू को। जिसकी शिष्य मीरा हो सिर्फ इतना ही वकतव्य ही संत रविदास को अति महत्वपूर्ण बना देता है। संत रैदास की भाषा प्रेम की भाषा है। भक्ति की भाषा है। जिस भी पेड़ को प्रेम से सींचा गया हो। जिस पेड़ की जड़ो में भक्ति का रस हो। ऐसे पेड़ तो प्रेम की सुगंध आना ही है। ऐसे वृक्षों की छाए में बैठकर ही कोई भी समाज हो या देश तरक्की करता ही है।

संत रविदास जी की एक घटना आप सब को पता होगी। लेकिन जिन लोगों को इसकी जानकारी न हो मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि संत रैदास की इस घटना से साफ जाहिर है कि अगर हम शुद्ध होकरए प्रभु में लीन होते है। तो हमें कहीं नहीं जाना है। जहां हम है वही इश्वर है। एक दिन संत रैदास ;रविदासद्ध अपनी झोपड़ी में बैठे प्रभु का स्मरण कर रहे थे। तभी एक राहगीर ब्राह्मण उनके पास अपना जूता ठीक कराने आया! रैदास ने पूछा कहां जा रहे हैंए ब्राह्मण बोला गंगा स्नान करने जा रहा हूं। जूता ठीक करने के बाद ब्राह्मण द्वारा दी मुद्रा को रैदासजी ने कहा कि आप यह मुद्रा मेरी तरफ से मां गंगा को चढ़ा देना। ब्राह्मण जब गंगा पहुंचा और गंगा स्नान के बाद जैसे ही ब्राह्मण ने कहा. हे गंगे रैदास की मुद्रा स्वीकार करोए तभी गंगा से एक हाथ आया और उस मुद्रा को लेकर बदले में ब्राह्मण को एक सोने का कंगन दे दिया।

ब्राह्मण जब गंगा का दिया कंगन लेकर वापस लौट रहा थाए तब उसके मन में विचार आया कि रैदास को कैसे पता चलेगा कि गंगा ने बदले में कंगन दिया हैए मैं इस कंगन को राजा को दे देता हूंए जिसके बदले मुझे उपहार मिलेंगे। उसने राजा को कंगन दियाए बदले में उपहार लेकर घर चला गया। जब राजा ने वो कंगन रानी को दिया तो रानी खुश हो गई और बोली मुझे ऐसा ही एक और कंगन दूसरे हाथ के लिए चाहिए।

राजा ने ब्राह्मण को बुलाकर कहा वैसा ही कंगन एक और चाहिएए अन्यथा राजा के दंड का पात्र बनना पड़ेगा। ब्राह्मण परेशान हो गया कि दूसरा कंगन कहां से लाऊंघ् डरा हुआ ब्राह्मण संत रविदास के पास पहुंचा और सारी बात बताई। रैदासजी बोले कि तुमने मुझे बिना बताए राजा को कंगन भेंट कर दियाए इससे परेशान न हो। तुम्हारे प्राण बचाने के लिए मैं गंगा से दूसरे कंगन के लिए प्रार्थना करता हूं।

ऐसा कहते ही रैदासजी ने अपनी वह कठौती उठाईए जिसमें वो चमड़ा गलाते थेए उसमें पानी भरा था। रैदास जी ने मां गंगा का आह्वान कर अपनी कठौती से जल छिड़काए जल छिड़कते ही कठौती में एक वैसा ही कंगन प्रकट हो गया। रैदासजी ने वो कंगन ब्राह्मण को दे दिया। ब्राह्मण खुश होकर राजा को वह कंगन भेंट करने चला गया। तभी से यह कहावत प्रचलित हुई कि ष्मन चंगाए तो कठौती में गंगाष्।

प्रहलाद सिंह पटेल,
केंद्रीय राज्य मंत्री,
खाद्य प्रसंस्करणउद्योग एवं जल शक्ति मंत्रालय,
भारत सरकार